अक्स न्यूज लाइन ऊना 6 फरवरी :
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में, ऊना नगर से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित मैड़ी गाँव की देवदार-आच्छादित पहाड़ियों के बीच डेरा बाबा बडभाग सिंह जी आस्था, साधना और आध्यात्मिक उपचार का एक प्राचीन एवं प्रसिद्ध केंद्र है। यह स्थल हर वर्ष उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। बाबा बडभाग सिंह जी का जन्म 1715 ईस्वी में पंजाब के करतारपुर में सोढ़ी वंश में हुआ माना जाता है। वे धीर मल के वंशज तथा गुरु गोबिंद सिंह जी के परिवार से संबंधित बताए जाते हैं। अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों के दौरान उत्पन्न अस्थिर परिस्थितियों से बचते हुए बाबा जी हिमाचल की ओर आए और धारशणी खड्ड के समीप वनों में साधना करते हुए अंततः मैड़ी में निवास करने लगे। मान्यता है कि बाबा बडभाग सिंह जी ने एक बेर के वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या कर अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त कीं। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, उन्होंने नरसिंह नामक एक उग्र आत्मा को वश में किया, जो कभी इस क्षेत्र में आतंक फैलाती थी। बाबा जी ने उसे मानव सेवा के लिए बाध्य किया, जिसके कारण आज भी मानसिक, शारीरिक और आत्मिक कष्टों से पीड़ित लोग यहाँ उपचार और शांति की कामना से आते हैं। डेरा परिसर का मुख्य केंद्र गुरुद्वारा और बाबा जी की समाधि है। इसके आसपास स्थित तपस्थली का बेर वृक्ष और चरण गंगा जलप्रपात विशेष श्रद्धा के केंद्र हैं। चरण गंगा के जल को पवित्र और रोगनाशक माना जाता है, जहाँ श्रद्धालु स्नान कर प्रार्थना करते हैं। हर वर्ष फरवरी–मार्च में आयोजित होने वाला 10 दिवसीय होली/होला मोहल्ला मेला मैड़ी को भक्ति और उत्सव के रंगों से भर देता है। इस दौरान हजारों श्रद्धालु अरदास करते हैं, पवित्र स्नान करते हैं और निशान साहिब के आरोहण के साक्षी बनते हैं। भारत की धार्मिक परंपरा केवल शास्त्रीय ग्रंथों और संस्थागत आस्थाओं तक सीमित नहीं रही है। देश के सांस्कृतिक परिदृश्य में ऐसे अनेक लोक-आधारित तीर्थस्थल हैं, जिन्होंने सदियों तक समाज को मानसिक स्थिरता, नैतिक दिशा और सामूहिक पहचान प्रदान की है। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित मैड़ी का डेरा बाबा बडभाग सिंह जी इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। 18वीं शताब्दी के अशांत दौर में, जब उत्तर भारत राजनीतिक उथल-पुथल और आक्रमणों से जूझ रहा था, संत परंपरा ने सामाजिक ताने-बाने को संभालने का कार्य किया। बाबा बडभाग सिंह जी का जीवन और साधना इसी व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में देखी जानी चाहिए। उनका मैड़ी में स्थायी निवास और साधना, सीमांत क्षेत्रों में आध्यात्मिक केंद्रों की भूमिका को रेखांकित करता है। नरसिंह से जुड़ी लोकमान्यता को अंधविश्वास के बजाय सामाजिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से समझना अधिक उपयुक्त होगा। ऐसे स्थल पारंपरिक समाजों में मानसिक तनाव, भय और असुरक्षा से निपटने के सांस्कृतिक माध्यम रहे हैं। चरण गंगा, तपस्थली का बेर वृक्ष और गुरुद्वारा परिसर आज भी इसी लोक-आधारित विश्वास प्रणाली के प्रतीक हैं। हर वर्ष आयोजित होने वाला होली/होला मोहल्ला मेला इस केंद्र को क्षेत्रीय सीमा से बाहर ले जाकर राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ता है। विभिन्न राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं की सहभागिता इसे सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक समरसता का मंच बनाती है। यह परिघटना भारत की उस परंपरा की याद दिलाती है, जहाँ आस्था विविधता को जोड़ने का कार्य करती है। ऐसे लोक-तीर्थों का संरक्षण केवल धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक इतिहास और सामाजिक अध्ययन के दृष्टिकोण से भी आवश्यक है। मैड़ी का डेरा बाबा बडभाग सिंह जी हमें यह समझने का अवसर देता है कि भारत की जीवंत संस्कृति किस प्रकार स्थानीय आस्थाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करती है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बाबा बडभाग सिंह जी की परंपरा केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक जीवंत आस्था है—जहाँ विश्वास, आशा और उपचार आज भी हिमालय की गोद में एक साथ प्रवाहित होते हैं।