हिमाचल प्रदेश के जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) परिदृश्य पर विचार-विमर्श
अक्स न्यूज लाइन शिमला 05 जून :
नाबार्ड, हिमाचल प्रदेश क्षेत्रीय कार्यालय (HPRO) द्वारा हिमाचल प्रदेश के पारंपरिक उत्पादों के लिए जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) आधारित आजीविका संवर्धन, बाजार संपर्क, उत्पादक संस्थाओं के विकास तथा पंजीकरण उपरांत हस्तक्षेपों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक बैठक का आयोजन किया गया। बैठक का शुभारंभ श्री संदीप शर्मा प्रभारी अधिकारी, नाबार्ड HPRO के मुख्य उद्बोधन से हुआ। उन्होंने जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण, उत्पादकों की आय वृद्धि, स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने तथा पर्वतीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने का एक प्रभावी माध्यम है। इसके पश्चात विचार-विमर्श को श्री कुशल दीप, उप महाप्रबंधक, नाबार्ड HPRO द्वारा आगे बढ़ाया गया। उन्होंने जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) मान्यता को गुणवत्ता आश्वासन, ब्रांडिंग, बाजार पहुंच और संस्थागत सहयोग के माध्यम से ठोस आर्थिक लाभों में परिवर्तित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) संवर्धन पर विस्तृत रोडमैप श्री हिमांशु बालियान, सहायक प्रबंधक, नाबार्ड HPRO द्वारा प्रस्तुत किया गया। इसमें जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) पंजीकरण के उद्देश्यों और लाभों पर चर्चा की गई, जिनमें कानूनी संरक्षण, दुरुपयोग की रोकथाम, उपभोक्ता संरक्षण, निर्यात संवर्धन, समुदायों का सशक्तिकरण, रोजगार सृजन, पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर पहचान शामिल हैं। बैठक में प्रमुख हितधारकों ने भाग लिया, जिनमें श्री दीपक कुमार, SLBC प्रभारी; श्रीमती दीपिका, संयुक्त निदेशक, उद्योग विभाग; तथा डॉ. देविना वैद्य, निदेशक अनुसंधान, डॉ. वाई.एस. परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी शामिल रहे। इनके अतिरिक्त नाबार्ड HPRO के अधिकारी एवं अन्य सहभागी संस्थानों के प्रतिनिधि भी बैठक में उपस्थित रहे।
बैठक के दौरान नाबार्ड HPRO द्वारा समर्थिततीन उत्पादों — हिमाचली रणसिंघा, हिमाचली वुड क्राफ्ट और हिमाचली गलीचा — के जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) पंजीकरण हेतु चल रही प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की गई। प्रतिभागियों ने हिमाचल प्रदेश के जियोग्राफिकल
इंडिकेशन (GI) टैग प्राप्त पारंपरिक शिल्प चंबा चप्पल के लिए नाबार्ड के संभावित हस्तक्षेपों पर भी विचार-विमर्श किया। इसमें चंबा चप्पल क्लस्टर को उत्पादक संगठन सहयोग, डिजाइन सुधार, उत्पाद विविधीकरण, ब्रांडिंग और बाजार विकास के माध्यम से सशक्त बनाने
पर बल दिया गया। प्रस्तुति में हिमाचल प्रदेश के पहले से जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग प्राप्त उत्पादों जैसे कुल्लू शॉल, कांगड़ा चाय, चंबा रुमाल, किन्नौरी शॉल, कांगड़ा पेंटिंग्स, चंबा चप्पल, हिमाचली चुल्ली तेल, हिमाचली काला जीरा, लाहौली सॉक्स एवं ग्लव्स तथा बासमती चावल की स्थिति और संभावनाओं को भी रेखांकित किया गया। इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) पंजीकरण केवल प्रारंभिक चरण है तथा जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग को विश्वास, दृश्यता, प्रीमियम मूल्य और सतत आजीविका में परिवर्तित
करने के लिए निरंतर पंजीकरण उपरांत हस्तक्षेप आवश्यक हैं। बैठक में जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) उत्पादों के लिए वर्षभर मांग सुनिश्चित करने हेतु 365-दिवसीय मांग पाइपलाइन विकसित करने की आवश्यकता पर भी चर्चा की गई। इसके अंतर्गत एयरपोर्ट काउंटर, HPTDC होटल, मंदिर, संग्रहालय, विंटर स्पोर्ट्स स्थल, क्यूरेटेड जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) ट्रेल्स, ONDC/ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, कॉरपोरेट गिफ्टिंग, क्रेता- विक्रेता बैठकें तथा विशेष HP जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) प्रदर्शनियों जैसे माध्यमों पर विचार किया गया। प्रतिभागियों ने देशभर में जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) संवर्धन के क्षेत्र में नाबार्ड की भूमिका, विशेष रूप से जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) पंजीकरण, क्षमता निर्माण और पारंपरिक उत्पादों के विपणन सहयोग में उसके दीर्घकालिक योगदान की सराहना की। बैठक का समापन श्री विजय मीणा, सहायक प्रबंधक, नाबार्ड HPRO द्वारा किया गया। समापन में यह साझा समझ बनी कि हिमाचल प्रदेश में जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) आधारित विकास के लिए नाबार्ड, राज्य सरकार के विभागों, वित्तीय संस्थानों, विश्वविद्यालयों, उत्पादक समूहों और बाजार भागीदारों के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।









