देशव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ का किया गया शुभारम्भ

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 अक्स न्यूज लाइन शिमला 01 जून :
शिमला ने किसानों के बीच मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, उर्वरकों के संतुलित उपयोग, प्राकृतिक खेती तथा सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से देशव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की शुरुआत की है। अभियान का औपचारिक शुभारंभ संस्थान के कार्यवाहक निदेशक डॉ. जगदेव शर्मा ने किया। उन्होंने बताया कि यह पहल उर्वरकों के दक्ष उपयोग, मृदा स्वास्थ्य में सुधार, मृदा परीक्षण आधारित वैज्ञानिक फसल नियोजन तथा किसानों को विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के प्रति जागरूक करने पर केंद्रित है, जिससे दीर्घकालिक कृषि स्थिरता और किसानों की समृद्धि सुनिश्चित की जा सके।
संस्थान के ‘मेरा गांव मेरा गौरव’ कार्यक्रम के अंतर्गत गठित दो टीमों ने आज शिमला जिले के विभिन्न गांवों में जागरूकता एवं विस्तार गतिविधियां संचालित कीं। इसी क्रम में शिमला जिले के डोमेहर गांव में एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिक डॉ. सोम दत्त, डॉ. कैलाश नागा एवं डॉ. मनीषा ने किसानों को प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों और उसके लाभों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने किसानों को नकली उर्वरकों एवं कीटनाशकों से सतर्क रहने की सलाह देते हुए सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया। कार्यक्रम में जैविक उर्वरकों एवं जैव-कीटनाशकों के निर्माण की व्यावहारिक जानकारी भी दी गई। इस कार्यक्रम में लगभग 40 प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया।
सामाजिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. आलोक कुमार ने अभियान के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसके अंतर्गत किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग, हरी खाद तथा जैविक एवं जैव-आधारित कृषि आदानों के उपयोग संबंधी प्रशिक्षण प्रदान कर उनकी क्षमता विकसित की जाएगी। उन्होंने कहा कि जागरूकता कार्यक्रमों, खेत प्रदर्शनियों तथा व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।
डॉ. पिनबियांगलांग के., वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि इसी दिन डीपीएस रानीपुर, हरिद्वार (उत्तराखंड) तथा एसवीबी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, आईजीकेवी, दुर्ग (छत्तीसगढ़) के लगभग 150 विद्यार्थियों एवं प्रतिभागियों ने संस्थान का भ्रमण किया। इस अवसर पर तकनीकी अधिकारी श्री धर्मेंद्र गुप्ता ने उन्हें ‘खेत बचाओ अभियान’ के उद्देश्यों से अवगत कराया तथा कृषि उत्पादकता बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसानों की आय में वृद्धि के लिए विज्ञान-आधारित एवं सतत कृषि पद्धतियों के महत्व पर प्रकाश डाला।
वैज्ञानिकों ने फसलों की पोषक तत्व आवश्यकताओं के निर्धारण हेतु मृदा परीक्षण की आवश्यकता पर बल दिया तथा वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार उर्वरकों के संतुलित प्रयोग की सलाह दी। किसानों को मृदा उर्वरता बढ़ाने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए कम्पोस्ट, हरी खाद तथा समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) अपनाने के लिए भी प्रेरित किया गया।